बछवल के पूरबी छोर पर, जहाँ से पगडंडी खेतों की ओर निकलती थी, वहीं पर था वो पुराना कुआँ। पास ही शिवाला था, जहाँ सुबह-शाम घण्टियों की गूँज और शिवनाम की ध्वनि वातावरण को पावन कर देती। कुआँ थोड़ा हटकर, पीपल से जरा दूर, पर फिर भी उसकी छाया में ही था, मानो गाँव का पहरेदार हो— आने-जाने वालों को अपने शीतल जल से आशीष देता हुआ।
सुबह होते ही इस कुएँ के आसपास चहल-पहल शुरू हो जाती। गाँव की महिलाएँ— धनिया चाची, फूला ताई, कमला बुआ— घड़े-गगरी सँभाले, सिर पर ओढ़नी टिकाए कुएँ की ओर चल पड़तीं। कुएँ की जगत पर बैठकर कपड़े धोते-धोते एक-दूसरे से खबरों का आदान-प्रदान करतीं।
"अरी धनिया, मुन्ना के चिट्ठी आई का?"
"हओ, कहत है, अब तौ बम्बई में पक्का काम धंधा करब!"
पायल की छम-छम, चूड़ियों की खनक और पानी में घड़े डूबने-उतराने की मधुर ध्वनि कुएँ को जैसे जीवंत कर देती। पानी खींचने की रस्सी हर रोज कुएँ की देह से लिपटती, और उसका शीतल जल गाँव को तृप्त करता।
गाँव के छोरे-छोकरियों के लिए तो कुआँ जैसे खेल का मैदान था। स्कूल जाते-आते बच्चे कुएँ की मुँडेर पर चढ़कर भीतर झाँकते— अपनी परछाईं देख, तालियाँ बजाकर उसकी हलचल निहारते। कोई शरारती बच्चा पत्थर डालता तो पानी में उठते बुलबुले देख सब खिलखिला उठते। कुछ तो कुएँ में झाँककर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते—
"अरे ओ रामू!"
और जब कुएँ की गूँज वापस आती, तो सब ठहाके लगाते—
"देखो-देखो, कुआँ भी हमसे बतियावत है!"
कुएँ के पास से गुजरता था गल्यारा, जिससे होकर किसान अपने बैल, हल, और बीज लेकर खेतों की ओर जाते। बैलों के गले में पड़ी घंटियाँ जब बजतीं, तो पूरा गलियारा उनके गुजरने की राह तकता, जैसे वो भी उनके संग खेतों की ओर बढ़ चला हो। मिट्टी से सनी धोती सँभालते, एक-दूसरे को राम-राम कहते, बीड़ी सुलगाते हुए किसान जाते। कुएँ की ओर निगाह डालते और कभी-कभी दो घूँट पानी पीकर ही आगे बढ़ते।
पंडित जी तो बिना नागा हर सुबह लोटा भर पानी लेकर शिवालय में चढ़ाने जाते। उनके चरणों की आहट और जलधारा की छप-छप कुएँ के लिए किसी आरती से कम न थी।
और कुएँ की मुँडेर पर हर शाम दिया जलाने आती थी बिट्टो। उसका असली नाम भले कोई न जानता हो, पर गाँव भर में वो "बिट्टो बिट्टो" कहकर ही पुकारी जाती। जब साँझ ढलती, वो सिर पर आँचल डाले, हाथ में दिया-बाती लिए आती, और कुएँ की मुँडेर पर घी का दीपक जलाकर लौ को थरथराते हुए देखती। कुएँ के जल में उसकी रोशनी झिलमिलाती, और ऐसा लगता, जैसे खुद कुआँ भी बिट्टो की परछाईं को अपने सीने में संजो लेना चाहता हो।
पर अब बिट्टो नहीं आती। कुछ महीनों पहले उसके लड़के उसे शहर ले गए। कहते थे, "अम्मा, अब अकेले गाँव में मत रहो, यहाँ सब सुविधा है, एसी-पंखा, नल का पानी, डॉक्टर। गाँव में का धरा है?" बिट्टो के जाने के बाद न वो दिया जलता, न कुएँ की मुँडेर पर कोई बैठता। अब वहाँ बस सूखी पत्तियाँ गिरतीं, और वीरान हवा उनके संग खेलती।
फिर सब बदल गया...
धीरे-धीरे कुएँ की मुँडेर सूनी होने लगी। गाँव में पहले हैंडपंप लगे, फिर मोटर आईं, और अब हर घर में नल से पानी बहने लगा।
अब धनिया चाची न कपड़े धोने आतीं, न फूला ताई गुनगुनाती। अब कोई कुएँ की जगत पर बैठकर बतियाता नहीं। पंडित जी भी अब घर के नल से लोटा भर लेते हैं, कुएँ तक कौन जाए!
अब न पायल की छम-छम सुनाई देती, न चूड़ियों की खनक। ढोल-मंजीरे की थाप तो जैसे किसी और ज़माने की बात हो गई। बैलों के गलों में बँधी घंटियों की आवाज़ भी कम होती गई, ट्रैक्टरों ने उनकी जगह ले ली। कुएँ की मुँडेर पर अब बस सूखी पत्तियाँ गिरती हैं, और हवाएँ अकेलेपन का गीत गाती हैं।
एक रात कुएँ ने गहरी साँस ली और कहा—
"का रे! भूल गए हमका? अरे, का बिगाड़ा था हमने? एक समय था जब बिना हमरी मुँडेर पे आए तुम लोग न दिन शुरू करते थे, न रात पूरी। और अब... अब कोई झाँकता तक नाहीं! जब बुजुर्ग बेकार लगै लगिहैं, तब उनका भी ऐसे ही छोड़ देहौ? का तुम सबजन हमेशा जवानै बने रहिहौ?"
पर कोई सुनने वाला नहीं था।
गाँव के बच्चे, जो कभी कुएँ में झाँककर अपनी परछाईं से खेलते थे, अब मोबाइल में आँखें गड़ाए रहते। कोई कुएँ की गहराई को नापने के लिए आवाज़ नहीं लगाता, कोई पत्थर नहीं डालता। कुआँ अब न किसी को पुकारता, न कोई उसे।
और अब...
गाँव बदल गया, कुआँ सूना हो गया... अब बस देखना ये है कि पहले कुआँ ढहेगा, या लोग उसमें मिट्टी भर देंगे।