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श्रावण वर्षा : मुरझाते ऋतुपर्ण

श्रद्धा। आस्था। विश्वास। इन तीन जीवनशब्दों का प्रयोग हम जीवन भर करते रहते हैं। लगभग पांच हज़ार सालों से करते आ रहे। जीते आ रहे। क्या सचमुच ? यदि हम इन्हें जीते आ रहे तो फिर मनुष्य सभ्यता का इतिहास इन्ही शब्दों के बिल्कुल पास आकर अपमानित और छला गया क्यों मिलता है।

मुरझाते ऋतुपर्ण मुरझाते ऋतुपर्ण
Author
गौतम चटर्जी

वाराणसी , 07-08-2022


Faith. Trust. Belief.
श्रद्धा। आस्था। विश्वास।

इन तीन जीवनशब्दों का प्रयोग हम जीवन भर करते रहते हैं। लगभग पांच हज़ार सालों से करते आ रहे। जीते आ रहे। क्या सचमुच ? यदि हम इन्हें जीते आ रहे तो फिर मनुष्य सभ्यता का इतिहास इन्ही शब्दों के बिल्कुल पास आकर अपमानित और छला गया क्यों मिलता है। मनुष्य के ये कुछ ऐसे शव हैं जिनकी कभी अंत्येष्टि नही हुई। जो विश्वास की इस मृत्यु को देखता है वह स्वयं शववत हो जाता है, कि इस बार उसकी बारी है।

भाषा में श्रद्धा को ईश्वर के साथ, आस्था को प्रकृति और जीवन मूल्यों के साथ और विश्वास को पारस्परिक प्रेम संबंध में मूल्य की तरह देखा और बरता जाता है। विश्वास टूटने पर प्रेम का अंत और प्रेम के अंत पर जीवन निस्सार हो जाता है। प्रेम होने पर जीवन स्वप्नवत और प्रेम का अंत होने पर जीवन शववत हो जाता है। देखा और अनुभूत यही किया गया है मनुष्य जीवन मे पिछले पांच हज़ार सालों में। अनवरत। विश्वास या प्रेम के स्तर पर यदि एक बार जीवनछंद टूट गया तो फिर दोबारा जुड़ना अस्वाभाविक हो जाता है। जीवन विषाद से भरा एक उपन्यास बन जाता है जिसे लेखक स्वयं नही पढ़ सकता। मनुष्य और मनुष्य के बीच के इस नाजुक जीवनगीत को बचाया जा सकता है ?

आइये बचाया जाय।

अविश्वास, छल या टूटने के सही कारण को यदि समझ लिया जाय तो विश्वास कभी नही टूट सकता। स्वार्थ अंतिम कारण है। हम प्रथम कारण को देखने जा रहे। दिखता क्या है ? जो देखते हैं वही दिखता है। जो देखने जाते हैं वही प्रकट होने लगता है। सप्रमाण। वास्तव में सही क्या है समझ नही आता इसलिए अपनी सुविधा के लिए हम संबंधित व्यक्ति को दोनों से युक्त मान लेते हैं, गुण और अवगुण। एक समय मे एक का ही प्रभुत्व रहता है। तो क्या हम अपने भाव के अनुसार देखते हैं ? यदि अपने सुंदर भाव के कारण हम मित्र को सुंदर देखते हैं तो यह सौंदर्य हमेशा के लिए नष्ट कैसे हो जाता है ? एक सुंदर संबंध को हम बचा क्यों नही पाते ? तब हम उस असुंदर को अपने भाव से जोड़ कर क्यों नही देखना चाहते ? हम प्रेम करते हैं और प्रियतम सुंदर रहता है। कई साल जी जाते हैं। कि तभी कुछ दिख जाता है। असुंदर। हो सकता है उसमें हो। हो सकता है उन पलों में हम ही किसी परेशानी में हों। अक्सर हम उसी को बुरा मान बैठते हैं जिसमे बुराई दिखी। सप्रमाण। देखने जाएंगे तो दिखेगी भी। सप्रमाण। हमने बुरा देखने की कोशिश की तो दिखी भी और विश्वास ढेर हो गया, रह गया एक लगातार दुख। हृदय से लगातार रिसता दुख। जिस पल हम अपने प्रेम में, प्रियतम में, प्रियतमा में बुराई देखने गए, उसी पल वह बुराई हुई। वही बुराई है। evil. कबीर साहब कहते हैं, बुरा जो देखने मै चला ... मुझसे बुरा न कोई।

जो प्रेम करता है वह बुरा देखने जाता है, जो विश्वास करता है वह संदेह करने जाता है ! है न विडंबना, अपनी ही। संदेह हुआ यानी जो पहले था उसे विश्वास कहा जाय !

उससे पहले तक के प्रत्यक्ष प्रेम, मूल्य और गुणों का क्या हुआ ? बुद्धि के उपद्रव ने इतने समय के प्रेम और विश्वास को एक पल में नष्ट कर दिया। फिर जिये हुए प्रेम का मान क्या रहा ! प्रेम पर या विश्वास पर तो ऐसा आत्मविश्वास रहना था कि कोई तीसरा यदि मेरे प्रेम के विरुद्ध साक्ष्य भी लेकर आये तो मेरे आत्मविश्वास के कारण उसे उसका साक्ष्य ही संदिग्ध लगने लगे ! वह आत्मविश्वास क्यों नही होता हममे ? क्या यही प्रथम कारण है ? यदि हां तो पहले मनुष्य को प्रेम से पहले कुछ और अर्जित करना पड़ेगा, एक अटूट तत्व जिसके कारण न कभी विश्वास टूटे न प्रेम। दोनो एक ही है।

प्रकृति में परिवर्तन है ऐसा हम पढ़ते सुनते और मानते रहते हैं जबकि देख सकते हैं कि प्रकृति में कोई परिवर्तन नही होता। ऋतु से लेकर नक्षत्र तक सभी अनादि समय से अपरिवर्तित ढंग से गतिशील हैं। परिवर्तित मनुष्य होता है इसलिए बदलता संसार है जो प्रकृति का ही एक स्तर है, चेतना के कई स्तरों में से एक। यदि मनुष्य बदलता है तो संबंध स्थाई कैसे हो ? यहीं हमे पूछना पड़ता है कि जीवन मे क्या कुछ ऐसा भी है जो बदलता नही ! हम ढूंढते हैं तो हमे मिल भी जाता है। यह न बदलता हुआ, अनश्वर, शाश्वत और मृत्युहीन तत्व faith या श्रद्धा है जो मनुष्य के मानस पर निर्भर नही। हमे आस्था है, विश्वास है, श्रद्धा है, तुम पर, ऐसा कोई वाक्य नही बनता। श्रद्धा एक तत्व है जिसे मैंने ढूंढा जो प्रेम की रक्षा करता है, जो हमें विश्वसनीय और जीवंत बनाता है, जिसे लोग ईश्वर कहते हैं, ऐसे वाक्य का विन्यास हो सकता है। और जब हम ऐसा अपरिवर्तनशील अरूप तत्व ढूंढ लेते हैं तो वही परिवर्तनशील रूप में भी दिखने लगता है। अब यह संबंध, विश्वास या प्रेम कभी टूटने वाला नही। अंदर भय है तो वह किसी भी चीज़ से जुड़कर व्यक्त होगा। अंदर अटूट प्रेम है, विश्वास है तो वह किसी से भी जुड़कर व्यक्त होगा, घास हो या आकाश,वृक्ष हो या मनुष्य। भय होगा तो प्रेम नही। संदेह होगा तो विश्वास नही। प्रेम नही तभी परिवर्तनविहीन श्रावणवर्षा में भी जीवन के पत्ते, ऋतुपर्ण, मुरझा कर शववत भीगते रहते हैं। जिन्हें यह प्रेम मिला है वे प्रायश्चित करते हैं सभी प्रेमवंचित या प्रेमआहत जीवन, दुःख में लगातार भीग रहे जीवन के पक्ष में। प्रार्थना के गानस्वर में। अपने निस्तब्ध मौन में। मन के निर्जन एकांत में।

यह कविता, अंत मे, या प्रथमतः -

सुना है
बचपन मे जो चिड़ियों के घोसले उजाड़ते हैं
बड़े होकर उनके घर नही बसते
सुना है
जो चिड़ियों के अंडे फोड़ते हैं
उनके बच्चे नही होते
या होकर भी नही होते।

तुमने और कुछ तो नही सुना ?

पूछती है वह
मुझसे
और हर सुबह
घर के मुख्यद्वार पर
चावल की अल्पना देती है।


Published: 07-08-2022

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