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ओबीसी आरक्षण : सरकार की चूक या नाकामी

ओबीसी आरक्षण के मसले पर सत्ताधारी भाजपा और योगी सरकार को विपक्षी दलों की कड़ी आलोचना का शिकार होना पड़ा है। उच्चतम न्यायालय द्वारा पहले से ही तय दिशा-निर्देशों का पालन करने से सरकार बचती रही, अथवा जान-बूझकर सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन की अनदेखी की गयी।

सरकार की चूक या नाकामी सरकार की चूक या नाकामी
Author
जेपी गुप्ता

लखनऊ, 14-01-2023


यूपी नगर निकाय चुनाव को लेकर उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सूबे की सियासत में घमासान मचा। पिछड़ो को आरक्षण देने के मुद्दे पर सूबे की योगी सरकार की बड़ी किरकिरी हो चुकी है। ओबीसी आरक्षण के मसले पर सत्ताधारी भाजपा और योगी सरकार को विपक्षी दलों की कड़ी आलोचना का शिकार होना पड़ा है। उच्चतम न्यायालय द्वारा पहले से ही तय दिशा-निर्देशों का पालन करने से सरकार बचती रही, अथवा जान-बूझकर सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन की अनदेखी की गयी। यही नहीं इसके पहले महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में निकाय चुनावों को लेकर कोर्ट की कार्यवाही भी बतौर नजीर सरकार के सामने थी। इसके बावजूद भी सरकार से इतनी बड़ी चूक हो जाना साधारण बात नही मानी जा सकती है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के फैसले के बाद सरकार के सामने अजीबो-गरीब स्थिति पैदा हो गयी थी। कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक यदि सरकार समय से चुनाव कराती है तो पिछड़ो को कोर्ट की मंशा के अनुरूप आरक्षण देना नामुमकिन था। बगैर आरक्षण के सरकार यदि चुनाव कराती भी तो पहले से भाजपा और योगी सरकार पर आरक्षण को खत्म करने के विपक्षी दलों द्वारा लगाये जा रहे इल्जाम सही साबित हो जाते जिसका नुकसान भी भाजपा को उठाना पड़ता। ऐसी दशा में सरकार ने किसी प्रकार का कोई जोखिम नही उठाया। सरकार ने हाइकोर्ट के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की। सरकार की ओर दाखिल विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के बाद यूपी सरकार को राहत मिल गयी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। साथ ही ट्रिपल टेस्ट के जरिए पिछड़ो का आरक्षण तय करने के लिए सरकार द्वारा गठित पिछड़ा वर्ग आयोग को निर्देशित किया है कि वह 31 मार्च तक अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दे। आम जनता के बीच भले ही सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लेकर उत्सुकता रही हो लेकिन यह तय माना जा रहा था कि सरकार को सुप्रीम राहत मिल जायेगी। इसकी वजह भी महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश राज्य के लिए आये सुप्रीम फैसले बतौर नजीर सामने थे।

जब यूपी सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की गयी थी उस समय कई पहलू उभर कर सामने आये थे। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि सरकार को राहत मिल भी सकती है और नहीं भी। सरकार के सामने तीन विकल्प थे। पहला यह कि सुप्रीम कोर्ट सरकार को आयोग की रिपोर्टा के आधार पर पिछड़ो को आरक्षण का निर्धारण कर चुनाव कराने की अनुमति दे। साथ ही चुनाव कराने की समय सीमा भी तय कर दे। दूसरा पहलू यह भी था कि यदि सर्वोच्च न्यायालय सरकार की याचिका को निरस्त कर दे तो केन्द्र सरकार लोकसभा में इससे जुड़ी कोई बिल लाकर ओबीसी आरक्षण के साथ चुनाव कराने का रास्ता निकाल ले। इस प्रक्रिया में काफी अधिक समय लग सकता है साथ ही इसके लिए केन्द्र सरकार को सभी राज्यो की सहमति लेना भी जरूरी होगा। तीसरे पहलू में जब हम प्रवेश करते हैं तो उच्च न्यायालय का फैसला सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन पर आधारित होने के कारण सुप्रीम कोर्ट सरकार की एसएलपी को खारिज भी कर सकती है। ऐसी दशा में सरकार के सामने एक विचित्र समस्या पैदा हो सकती है। ऐसा कुछ नही हुआ। परम्परागत तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने पल टेस्ट के जरिए चुनाव कराने का सांकेतिक आदेश दे चुकी है।

यूपी की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के फैसले पर गौर करे तो यूपी हाईकोर्ट के फैसले में कुछ नया नहीं है। इसके पहले भी मध्य प्रदेश और महाराष्ट की हाईकोर्ट इसी तर्ज पर फैसला सुना चुकी है। महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने 92 नगर परिषद और नगर पंचायतो के लिए अधिसूचना जारी की थी। यहां भी ओबीसी आरक्षण के लिए ट्रिपल टेस्ट का पालन नही किया गया था। मामला अदालत पहुंचा। अदालत ने अपने फैसले में आरक्षण अधिसूचना निरस्त करते हुए सभी सीटे सामान्य घोषित कर दिया था। महाराष्ट्र सरकार एक अध्यादेश लेकर आयी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उस अध्यादेश को मानने से इंकार करते हुए अध्यादेश को रद्द कर दिया था। 11 मार्च 2022 को उद्धव सरकार ने बांठिया कमीशन का गठन किया था।

इसी प्रकार की घटना मध्य प्रदेश से भी जुड़ी हुई है। एमपी की शिवराज सिंह चौहान सरकार भी ऐसी दुश्वारियों के दौर से गुजर चुकी है। चौहान सरकार ने भी ट्रिपल टेस्ट के बगैर निकाय चुनाव के लिए आरक्षण अधिसूचना जारी किया था। मामला जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचा। यहां की अदालत ने भी आरक्षण अधिसूचना रद्द करते हुए बगैर आरक्षण के चुनाव कराने का आदेष दिया था। राज्य सरकार जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयी। यहां भी शिवराज चौहान को राहत नही मिली। सुप्रीम कोर्ट ने बगैर ट्रिपल टेस्ट के आरक्षण लागू किए बिना चुनाव कराने की अनुमति नही दी। चौहान सरकार ने रिव्यू पिटीसन दायर किया। राज्य पिछड़ा आयोग के जरिए एक रिपोर्ट बनवाई। इस रिपोर्ट में 52 जिलो के आंकड़े रखे गये थे। ट्रिपल टेस्ट रिपोर्ट के बाद ही कोर्ट ने चुनाव कराने की अनुमति दी।

ओबीसी आरक्षण को लेकर साल 1994 में एक अधिनियम बना था। इस अधिनियम के तहत रैपिड सर्वे के बाद पिछड़ो का आरक्षण तय कर चुनाव कराने की व्यवस्था दी गयी है। खास बात यह है कि न्यायालय द्वारा अब तक इस अधिनियम को निरस्त भी नही किया गया है। 1994 में कानून बनने के बाद साल 1995, 2000, 2006, 2012 और 2017 में इसी फार्मूले पर निकायो और त्रिस्तरीय पंचायतो के चुनाव कराये जा चुके है। साल 2001 की जन गणना के बाद 2005 मं पहला निकाय चुनाव हुआ था। इस चुनाव में भी 1994 के अधिनियम के तहत आरक्षण दिया गया था। साल 2017 के बाद भाजपा की योगी सरकार द्वारा अब तक 111 नगर निकायों का गठन और 130 नगर निकायो का सीमा विस्तार किया जा चुका है। उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने सरकार की इन दलीलो को खारिज कर दिया। जिसकी वजह से सरकार को विपक्षी दलों की आलोचना का षिकार होना पड़। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि माननीय न्यायालयो द्वारा साल 1994 में बने इस अध्निियम को संज्ञान में नही लिया गया। जिसकी वजह से सरकार द्वारा बार-बार उसी कानून की दुहाई देती रही। यदि न्यायालय साल 1994 में बने इस कानून को स्वतः संज्ञान में लेकर निरस्त कर देती तो सरकार के सामने ट्रिपल टेस्ट का फार्मूला ही एकमात्र विकल्प बचता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक बार हम ट्रिपल टेस्ट फार्मूले पर गौर करते है। इस फार्मूले के तहत करीब 12 साल पहले सुप्रीम र्कोअ ने फैसला दिया था कि राज्यो में स्थानीय निकायो के चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग के पिछड़ेपन की स्थितियां आर्थिक एवं षैक्षणिक प्रकृति और प्रभाव के आंकड़े जुटाने के लिए विषेष आयोग का गठन जयरी है। दूसरे आयोग की सिफारिषो के आधार पर नगर निगम, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतो के चुनाव में आनुपातिक आधार पर आरक्षण देने की व्यवस्था निहित होगी। तीसरे राज्य सरकार को यह भी ध्यान रखने की हिदायत दी गयी थी कि एससी, एसटी और आबीसी के लिए आरक्षित सीटो की संख्या 50 फीसदी के कुल आरक्षण की सीमा से बाहर नही होने पाये।

सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायो में ओबीसी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर 4 मार्च 2021 को विकास किसन राव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य के मामले में ट्रिपल टेस्ट को रेखांकित कर चुकी है। यूपी की यांगी सरकार ने 17 नगर निगमो के महापौर 200 नगर पालिकाओं और 545 नगर पंचायतो के अध्यक्षो के आरक्षित सीटो की अनंतिम सूची 5 दिसम्बर 2022 को अधिसूचना जारी की थी। जिसमें चार महापौरोके लिए आरक्षित की थी। जिसमें अलीगढ़, मथुरा ओबीसी महिला और मेरठ, प्रयागराज ओबीसी के लिए आरक्षित की थी। 200 नगर पालिकाओं में 54 सीटे ओबीसी महिलाओं के लिए तथा 18 सीटे ओबीसी के लिएआरक्षित की थी। इसी प्रकार 545 नगर पंचायतो में 147 सीटे ओबीसी महिला और 49 सीटे ओबीसी के लिए आरक्षित की थी। योगी सरकार की इस अधिसूचना को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पिछले 27 दिसम्बर को निरस्त कर चुकी है।


Published: 14-01-2023

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