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दिल्ली का जीता दिल : अब यूपी में तलाश रहे ठिकाना

आप के केजरीवाल के दिल्ली करिश्मे से भाजपा के कमल की पंखुरिया बिखर गयी थीं. दिल्ली के बाद आप अपने संगठन का विस्तार करने की मंशा जाहिर कर चुकी है. वह यूपी की सियासत में अपनी पैठ बनाने की गरज से जनसामान्य से जुड़ी सहूलियतों के जरिए आप सूबे में अपनी संभावनाऐं तलाश रही है। इस लिहाज से जनमानस पटल पर अपनी पटकथा लिखने को आप ने यूपी में दस्तक दे दी है. बीते 23 फरवरी 2020 को राजधानी लखनऊ में आप अपनी मौजूदगी का अहसास कराने की पहल कर चुकी है और अब पंचायत चुनाव में बाकायदा ताल ठोक रही है.

अब यूपी में तलाश रहे ठिकाना
अब यूपी में तलाश रहे ठिकाना



दिल्ली का दिल जीतने के बाद आम आदमी पार्टी की निगाह मुल्क के सबसे बडे सूबे यूपी पर केन्द्रित है। आप के केजरीवाल के दिल्ली करिश्मे से भाजपा के कमल की पंखुरिया बिखर गयी थीं. दिल्ली के बाद आप अपने संगठन का विस्तार करने की मंशा जाहिर कर चुकी है। वह यूपी की सियासत में अपनी पैठ बनाने की गरज से जनसामान्य से जुड़ी सहूलियतों के जरिए आप सूबे में अपनी संभावनाऐं तलाश रही है। इस लिहाज से जनमानस पटल पर अपनी पटकथा लिखने को आप ने यूपी में दस्तक दे दी है। बीते 23 फरवरी 2020 को राजधानी लखनऊ में आप अपनी मौजूदगी का अहसास कराने की पहल कर चुकी है। प्रारम्भिक चरण में आप सदस्यता अभियान का आगाज करके जनता के बीच पहुंची। इसके अलावा कार्यकर्ता सम्मेलन, जनसभाओं के साथ ही सोशल मीडिया को भी अपने अस्त्र के रूप में वह प्रयोग कर रही है। यही नहीं समाचार पत्रों की सुर्खियों में भी आप रहने लगी है। आम आदमी पार्टी की यूपी इकाई दिल्ली की केजरी सरकार द्वारा दी जा रही जनसुविधाओं को जनता के बीच परोस रही है। यूपी की जनता को आप आश्वस्त करना चाहती है कि केजरीवाल सरकार ने जनता से जो वादे किए थे उन्हे धरातल पर स्थापित कर जनता को वे सारी सहूलियतें मुहैया कराने का काम किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि 2020 में हुए दिल्ली विधान सभा के आम चुनाव में आप भाजपा के मुकाबले अन्य राज्यों के विपक्षी दलों के नेताओं की सहानुभूति बटोरने में कामयाब रही थी।

यूपी मे नाकाम रहे रहे हैं दूसरे राज्यों के सियासी जौहरी

मुल्क के अन्य राज्यों के सियासी जांबाज अपने सूबे में तो अपना सियासी जौहर का बखूबी प्रदर्शन करते आ रहे है, लेकिन यूपी की सियासत में वे खुद को स्थापित करने में नाकाम रहे हैं। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, मराठा क्षत्रप शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बिहार के सीएम नीतीष कुमार की राष्ट्रीय जनता दल, राम विलास पासवान की जनशक्ति पार्टी का यूपी में संगठन तो है लेकिन वह संगठन सिर्फ कागजो और दफतरो तक सिमटा हुआ है। जनता के बीच न तो कोई लोकप्रियता है और न ही जनाधार। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अतीत से चले आ रहे मिथक को क्या आप तोड़ने में कामयाब हो पायेगी ? यदि आप ऐसा करने में सफल रही तो यू पी की सियासत को एक नये आयाम की उम्मीद बन सकती है।

सपा,बसपा, कांग्रेस और भाजपा की बढ़ सकती हैं मुश्किलें !

यूपी की सियासत में यदि आप का मजबूत पदार्पण होता है तो यहां सपा, बसपा, कांग्रेस ही नहीं भाजपा की भी सियासी डगर कठिन हो सकती है। हालांकि आप के लिए खास तौर पर भाजपा के कट्टरपंथी और सपा, बसपा के जातीय समीकरण को भेदना आसान नहीं होगा। इसके बावजूद आप उदारवादी एवं तटस्थ मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। आप अपने मकसद में यदि कामयाब होती है तो भाजपा का कट्टरवाद और सपा, बसपा का जातीय समीकरण बिगड़ सकता है। रही बात कांग्रेस की तो वह यूपी में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर ही रही है।


Published: 05-04-2021

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